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Monday, January 25, 2010

निशब्द










देखा था उसको बचपन में , पाठशाला के आँगन में
वो भैया के संग आती थी , छुप छुप  के मिटटी खाती थी.
काजल से सनी आँखे मोटि, वो लाल रिबन  और दो चोटी
मेरे मन को बड़ी भाति  थी ,जब बात करो तुतलाती   थी,
सोची ना कभी कोई बात ओछी,  सिर्फ एक बार उसकी नाक पोछी
में  शंकित ,मोहित , स्तब्ध  रहा  , और  प्रेम मेरा  निशब्द रहा


कुछ वर्ष गए ,वो फिर से मिली , लगती थी कुछ बदली बदली
वो संस्कृत मुझे पढ़ाती थी , खुद को मैडम कहलाती थी .
में जब उससे चांटा खता था , तो  अगले दिन ना नहाता था
मेने संस्कृत में टॉप किया ,किस्मत  ने प्लान फ्लॉप किया
वो  जॉब  छोड़  कर चली गयी , मेरी महनत यूँ छली  गयी
में शंकित ,मोहित , स्त्ब्थ रहा  , और  प्रेम मेरा  निशब्द रहा


कुछ वर्ष गए , हम किशोर हुए ..आस पास वालों से बोर  हुए
हम थे योवन   की  चोखट पे , जब देखा उससे चित्र पट पे
वो बेल सद्रश्य बल खाती थी , नायक से चिपटी जाती थी
बारिश में गाना गति थी , ना पूछो क्या क्या कर जाती थी
मेने  नायक को कॉपी किया ,पर बन ना सका  उसका  पिया
में शंकित ,मोहित , स्तब्ध रहा  , और  प्रेम मेरा  निशब्द रहा .


कालेजे  आया हम युवा हुए , लगता था जैसे खुदा हुए
हमारे दिल में एक सपना था , हमने दुनिया को बदलना था
हम तडित मेघ सुनामी थे , बदनाम बहुत  पर नामी थे
हम थे बड़े क्रांति कारी , वो आयी बनके विपदा भारी


आँखे उसकी  नूरानी थी ,वो पापा की  गुडिया रानी थी .
कॉलेज में जब वो आती थे , शर्माती थी सकुचाती थी ,
किसी से भी नहीं बतियाती थी , और मुझे देख मुड जाती थी .
था उसमे ऐसा आकर्षण , जैसे के दिन की पहली किरण
में  प्रिंसिपल से लड़ जाता  था  , पर उससे देख हकलाता  था  
में शंकित ,मोहित , स्तब्ध  रहा  , और  प्रेम मेरा  निशब्द रहा .


फिर दिन बीते में बड़ा हुआ , आपने पेरो पे खड़ा हुआ
देखी जीवन की  धुप छांव , फिर आयी वो चंचला दबे पाँव.
अब मिली मुझे वो , मत पूछो कहाँ , में उसे पा नहीं सकता जहाँ
अब  मैंने  जब उसको देखा , तो  देखी एक  लक्ष्मण रेखा
है किसी और के वो संग खड़ी , बातें करती है बड़ी बड़ी
जीवन का अर्थ समझाती है , पर देख तिमिर डर जाती है
मेने ना कभी  इज़हार किया , उसने ने ना कभी इंकार किया
में शंकित ,मोहित , स्तब्ध  रहा  , और  प्रेम मेरा  निशब्द रहा .


अब   दिन ढलता  है कार्यालय में , और रात कटे मदिरालय में
अब इनकम टैक्स में भरता हूँ ,  प्रति वर्ष  तीस प्रतिशत मरता हूँ
एक दिन केश राशी ,झड जायेगी और तोंद बहार आ जायेगी
एक छवि मुझे सतायेगी , रातों में मुझे जगाएगी
क्यों  शंकित ,मोहित , स्तब्ध रहा  , क्यों   प्रेम मेरा  निशब्द रहा .


This  is something I wrote this weekend . a poem partially inspired by real life . It document my  search for perfection . I hope you like it .