24 years of existence: No invention and No incorporation yet! Even Mt. Everest remains out of reach. What a waste the years have been!!
Here is something I wrote last night . These thoughts were germinated in my mind around my birthday couple of days back .It reached a crescendo last night and result is this poem. I hope you would like it.प्रारंभ से पूर्व ही पटाक्षेप हो गया ,
जीवन प्रवाह में स्वप्न बस अवक्षेप हो गया
करता रहा प्रतीक्षा , रात भर वो भोर की
सोचा किया की , क्षितिज पार कहीं सूर्य सो गया
बचपन में था चाहा उसने छुना आकाश को
फिर घोसले का प्रेम उसकी बेडी हो गया
जीवन में शीत आयी तौ दाना " खुदा" हुआ
रिमझिम जो बरसे मेघ तो , महा भोज हो गया.
कौए की भांति पाले उसने, सपने किसी और के
जब उड़ गयी वो कोयलें , वीराना हो गया.
देखो सरल इंसान कितना गूढ़ हो गया
योवन के राह देखने में प्रोढ़ हो गया
सर्वत्र है सम्मान उसका , पर किसको ये ज्ञात है
जय घोष में दबी कहीं जो उसके दिल की बात है
कर कर के हर किसी की कही , वो महान बन गया
जन्मा था जो परिंदा वो अब इंसान बन गया
Note:Regular reader of "knowprashant" might remember when same thing happened last time . This time however I was not exceptionally happy or sad that day . but its kinda hard not to reflect on your life on your birthday.